+91 96348 65111 desksaket@gmail.com

परिचय



हमारी पुरातन कृषि व्यवस्था के तीन अति महत्वपूर्ण आधार स्तम्भ रहे हैं। ये आधार हैं गाय और बैल, गोबर आधारित खाद, और देशी बीज। पिछले लगभग 60 वर्षों से किसी न किसी बहाने से इन तीनों अंगों को ही नष्ट करके किसान को बर्बाद करने का षडयंत्र सा चलाया जा रहा है। आजादी के बाद मुख्य रूप से हरित क्रांति, श्वेत क्रांति और अब जीएम क्रांति के युग का उल्लेख करना ज्यादा प्रासंगिक होगा। हरित क्रांति ने अधिक उत्पादन के विकल्प देने की आड में रासायनिक खाद और कीटनाशकों का प्रयोग किया जिससे गोबर और जैवभार आधारित खाद का प्रयोग बंद हुआ। कृषि के यंत्रीकरण की आड में परंपरागत ज्ञान और तकनीकों को रसायनों की भेंट चढ़ा दिया गया।

दूसरी ओर श्वेत क्रांति ने अधिक दुग्ध उत्पादन का लालच दिखाकर विदेशी गाय की आड में हमारे गौवंश को ही समाप्ति पर ला दिया है। हमारे देश में गाय का पालन केवल दूध देने के लिए ही नहीं होता था भले ही प्रत्यक्ष रूप से यही दिखाई देता रहा हो। परन्तु इसी बात की आड में लोगों को अधिक दूध पालन के लिए विदेशी गाय पालने के लिए प्रेरित किया गया। अब न लोग देशी गाय पाल रहे हैं और न ही बैल का प्रयोग खेती के कामों में हो रहा है। होगा भी कैसे ? जर्सी गाय के गोबर में देशी गाय की तरह पोषण देने वाले सूक्ष्मजीव जो नहीं हैं। इनके बछडे भी कृषि कार्य के लिए अनुपयोगी हैं।

रही सही कसर अब जीएम बीजों से पूरी हो जाएगी। जीएम बीजों का भयावह सच बीटी कॉटन के रूप में सामने है। जीएम फसलों के फायदे और नुकसान पर बहस छिडी हुई है। सबके अपने अपने तर्क और प्रमाण है। सभी अपने सत्य को स्थापित करना चाहते हैं परन्तु सार्वभौमिक सत्य की कोई बात नहीं करना चाहता है। प्रकृति प्रदत्त जैव-विविधता को समाप्त करने के लिए कृत्रिम रूम से अनुवांशिकी में संशोधन करना उचित तो कतई प्रतीत नहीं होता है। किसानों के हित में इनके उपयोग को बढ़ावा देना तो किसी भी कीमत पर तर्क संगत नहीं लग रहा।

सारे तर्क वितर्क से परे सत्य यह है की इतने वर्षों के बाद भी हम किसान की दशा नहीं सुधार पाए है। अपितु इसके उलट ऐसी नीतियाँ बना रहे हैं जिससे कि किसान की हालत और ज्यादा ही ख़राब हुई है। स्थिति इतनी ख़राब है कि किसान आज आत्महत्या करने को विवश हो रहा है।।? खेती से लोगों का मोहभंग हो रहा है।।? कही न कही बडी चूक हुई है और अभी भी हम आँख मूंदे बैठे हैं। अगर अभी भी कुछ नहीं किया तो फिर आने वाली पीढ़ी तो क्या हम इसी पीढ़ी के आस्तित्व में आने वाले संकट को भी नहीं टाल पाएंगे।

मानव को होने वाली बिमारियों का सबसे बडा कारण विषयुक्त खाद्य पदार्थ और विदेशी गाय का दूध ही है। हर कोई देशी गाय का ही दूध पीना चाहता है। विदेशी गाय द्वारा उत्पादित ।1 दूध के दुष्प्रभाव के कारण ही लोगों का इससे मोहभंग हो रहा है। आज कोई भी व्यक्ति खाद और रसायन से उपजाया जाने वाला भोजन नहीं खाना चाहता है। शुद्ध प्राकृतिक उत्पादों की मांग बढ़ रही है। मांग अनुरूप उत्पादन नहीं होने से शुद्ध खाद्यान्न की खोज अनवरत जारी है और समस्या जस की तस बनी हुई है। उपभोक्ता को विषमुक्त भोजन उपलब्ध नहीं हो पा रहा है।

यह तो मात्र एक ही आयाम है। जमीनी स्तर पर समस्यायें कहीं ज्यादा हैं और उतनी ही विकराल भी। विकास की आंधी के बीच किसान कहीं पर उपेक्षित सा हो गया है। उसी किसान को हाशिये से पुनः मुख्यधारा पर लाना है। क्षद्म विकास के नारों के बीच गांवों को पुनर्परिभाषित और पुनसर््थापित करना है। यह सब किसान को खुद ही करना है वो भी सिर्फ अपने दम पर। सब किसान मिलकर सामूहिक रूप से परिवर्तन की शुरुआत करते हुए दिख भी रहे हैं। सरकारी नीतियों से उलट यह परिवर्तन इस बार सही दिशा से अर्थात किसान के खेत से शुरु होता दिख रहा है। आत्मविश्वास से लबरेज ऐसे ही किसानों की सामूहिक विचारधारा “साकेत” के रूप आकर ले रही है। तो आइये जुडते हैं साकेत से और अपने हिस्से का योगदान करते हैं !!

जहाँ डाल डाल पर सोने की चिड़िया करती हैं बसेरा वो भारत देश है मेरा।

हमारे छोटे बचे कहें सीना तान। मैं भी बडा हो कर बनूँगा किसान।

जब धरती से सोना उपजेगा, गाँवों का देश भारत तभी बचेगा।